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कुछ साल बीत गए, जन्माष्टमी मेरे लिए त्यौहार से मात्र छुट्टी बन कर रह गई। जिस प्रकार वक़्त उस रात मेरे लिए नहीं थमा, उसी प्रकार ये जीवन भी चलता रहा। बहुत से बदलाव आए मेरे जीवन में, उनमें से कुछ मेरे स्वभाव में भी आए। वो बेबाकपन, वो अल्हड़पन अब मुझमें ना रहा। दुनिया की मानसिकता का, दोहरी और मैली सोच का असर कुछ ऐसा पड़ा कि मैंने खुद को उनसे अलग करना ही बेहतर समझा। बिना किसी से कुछ कहे, बिना कुछ बोले चुप-चाप सबसे खुद को अलग कर दिया फिर मैंने।

सब सोचने लगे कि इतनी बेबाक, खुलकर जीने वाली लड़की अचानक चुप कैसे हो गई? कैसे उसने खुद को अपने कमरे की चारदिवारी में बंद कर के रख दिया? कुछ ने इस सवाल को अपनी ज़बान पर भी लाया, पर जवाब में उन्हें खामोशी ही मिली।

और कहती भी तो क्या कहती? क्या बताती उन्हें कि मेरे साथ क्या हुआ था? उन कुछ पलों में उस रात जो घृणा मेरे मन में जन्मी थी, वो आज भी पनप रही है इस दिल में। एक बच्चे के मन में जन्मी घृणा वक़्त के साथ कई रूप लेती है, पर मेरे मन में इस घृणा ने क्या रूप साधा उसे मैं ब्यान नहीं कर सकती। नहीं दे सकती इसे कोई एक नाम, नहीं कह सकती के ये भाव जो मेरे दिल में है आखिर क्या हैं? बस इतना कह सकती हूँ कि यही भाव ही है जो ना मुझे उस रात को भूलने देता है, ना ही समझने देता है कि ऐसा क्यूँ हुआ?

आज उम्र के इस दौर पर जब मैं समझ गई हूँ कि ये दुनिया बड़ी ही मतलबी है और यहाँ सब कुछ ओरों की मर्ज़ी से होता है, आज जब मैं जानती हूँ कि मैं अकेली नहीं थी जिसके साथ ये सब हुआ । मैं अकेली नहीं हूँ जिसने जीवन में कदम कदम पर ऐसे हादसों को झेला है।

मैं अकेली नहीं हूँ जिसका पीछा कोई लड़का कॉलेज से घर तक हर रोज़ करता है। मैं अकेली नहीं जिसके माँ-बाप को बेटी के घर से निकलने से लेकर के शाम घर लौटने तक उसकी सुरक्षा का ख्याल सताता है। मैं अकेली नहीं हूँ जिसे अकेले तंग गलियों से गुजरने में डर लगता है। डर लगता है कि ना जाने कब कोई मुझे अकेला पा मेरा फायदा उठा ले। नहीं मैं अकेली नहीं जिसे बस में साथ बैठा बूढ़ा आदमी भी छूने की कोशिश करता है।

नहीं मैं अकेली नहीं जिसने हर गुज़रते आदमी की आँखों में अपने लिए लालसा देखी है। नहीं मैं अकेली नहीं जिसे ये सब हर रोज़ सहना पड़ता है।
ये सब बातें, ये सब जज़्बात कहूँ तो किससे कहूँ, कैसे कहूँ ?
ये सब जब मैं सोचती हूँ तो उस खुदा से, उस सर्वशक्तिमान से पूछ बैठती हूँ;

"ऐ खुदा ये बता मैं कौन हूँ ?

ज़िन्दगी है धुँआ, मैं मौन हूँ ।

पल-पल कोई मेरी ज़िन्दगी से खेल जाता है ,

आँखों के आगे मेरी ज़िन्दगी को रोल जाता है ।

फिर भी मैं मौन हूँ ,

तू ही बता ऐ खुदा मैं कौन हूँ ।

तेरे सांये में रह कर ज़िन्दगी को जाना था मैंने ,

तेरी रहमत में हर पल गुज़ारा था मैंने ।

फिर क्यूँ आज इससे अनजान हूँ मैं ?

तेरी रहमतों से महरूम हूँ मैं ?

बता ऐ खुदा मैं कौन हूँ

पल-पल ये अन्धेरा मुझे घेरता है

हर पल कोई हाथ मेरे बालों से खेल जाता है ।

बढाए मेरे हर कदम के साथ ,

ये अन्धेरा भी गहरा गया ।

जब वो हाथ मेरे बालो से

मेरे सीने तक आ गया ।

डर और घबराहट मेरे दिल को कचोटने लगी ,

धम-धम की आवाज़ मेरे कानों में गूंजने लगी ।

हर पल के साथ मेरा डर बड़ता गया ,

कानों में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा ।

आखिर कौन है ये ?

जिसके हाथ मुझसे खेलते हैं ?

मेरे दामन को यूँ खींचते हैं ?

अपने स्पर्श से मुझे नोचते हैं ?

मेरे ज़र्रे-ज़र्रे को चीरते हैं ?

जब ये ख्याल मुझे घेरते हैं

तो जैसे कोई आवाज़ मेरे मन में गूंजती है

मुझसे यूँ पूछती है ,

मुझे अंदर से झकझोङती है ।

आखिर क्यूँ तू ये सब सहती है?

क्यूँ तू अब भी मौन है ?

यही सवाल मैं आज खुदसे पूछती हूँ ,

आखिर कौन हूँ मैं ?

खिलौना हूँ कोई ?

या मॉम की गुड़िया हूँ ?

पत्थर की मूरत तो नहीं कोई ?

जिसे देख उसकी आँखें चमक जाती हैं ?

क्यूँ हर नज़र के साथ मेरे दिल की धङकन तेज़ हो जाती है ?

क्यूँ मेरा उठता कदम थम जाता है ?

फिर क्यूँ मेरे कदमों की रफ्तार बड़ जाती है ?

कैसा ये डर है जो मुझे झकझोड़ जाता है ?

जैसे कोई हाथ मेरे दिल को दबोच जाता है ।

क्यूँ मेरी आवाज़ मेरा साथ छोड़ देती है ?

क्यूँ मेरे हलग में मेरी चीख दब जाती है ?

क्यूँ कोई हाथ मेरी मदद नहीं करता ?

जब मेरी आँखें उनसे ये इल्तजा करती हैं ?

कैसा दर्द है ये आज भी मेरे सीने में ,

जो उस दिन को भूल ना पाया ?

कौन है ये आवाज़ जो मुझसे कहती है,

अब भी तू मौन है ,

जिंदगी है धुँआ क्यूँकी तू मौन है ।।"

हाँ मौन हूँ मैं!

चुप रही हूँ इतने साल मैं। पर आज ये आवाज़ मुझसे पूछती है कि 'क्यूँ मैं चुप हूँ?' ये अंजानी पर अपनी सी आवाज़ जो मुझे झकझोड़ती है और पूछती है, क्यूँ नहीं देती मैं उन सवालों के जवाब जो मुझसे पूछे जाते हैं?
क्यूँ नहीं बतला देती मैं जब सब अपना दिल हल्का कर रहे हैं? जब मैं जानती हूँ कि मैं अकेली नहीं थी, आज जब मेरे साथ की वो सब जिन्होंने ऐसा ही कुछ सहा है जो मैंने सहा था वो सब ब्यान कर रही हैं, वो अपनी लेखनी को अपनी आवाज़ बना रहे हैं, तो मैं क्यूँ नहीं?

शायद यही अहसास है जो मुझे हिम्मत दे रहा है कि इस चुप्पी को तोड़ सकूँ। ये अहसास कि अगर वो अपने दर्द को, अपनी घृणा को, अपनी शर्म को, उस खिज्ज को जो वो अपनी कमजोरी के कारण महसूस करती हैं, उन सब भावनाओं को अपनी लेखनी में बयान कर सकती हैं तो मैं क्यूँ नहीं?
क्यूँ नहीं तोड़ सकती मैं इस चुप्पी को जिसने मुझे मेरे अपनों से दूर कर, मुझे खुद से ही घृणा करवाई है?
क्यूँ नहीं तोड़ सकती मैं हर उस बन्धन को जिसने मुझे रोके हुआ है, ये सब कहने से?
आखिर क्यूँ, आखिर क्यूँ मैं ऐसी हूँ?

इन सवालों का शायद अभी मेरे पास कोई जवाब नहीं है, पर जवाब ढूंढू भी तो कैसे। तभी उस आवाज़ ने फिर मुझसे पूछा, एक बार फिर इसने मुझे झकझोड़ा कि आखिर क्यूँ मैं मौन हूँ?

पर कैसे कहूँ मैं इससे कि नहीं हूँ मैं, नहीं हूँ मैं वो बेबाक लड़की अब, नहीं मुझमें वो साहस अब।
कुछ सकुचा कर, बड़ी हिम्मत जुटा कर मैं ये कह रही हूँ कि

"हाँ मुझे डर लगता है!"

डर लगता है अपनी ख़ामोशी से, पर इससे भी ज़्यादा डर लगता है इसे तोड़ने से। पर आज इस डर पर काबू पाना है, ऐसा मैंने ठाना है। शायद इसलिए आप लोगों को ये सब बताने के लिए मैंने इस माध्यम को चुना है।

सवाल कई हैं मेरे मन में, कुछ खुद से तो कुछ ओरों से, पर जवाब एक ही है, कि मेरी हर नाकामी, हर दर्द, हर चुभन का बस एक ही कारण है और वो है मेरे दिल का डर। ये डर ही तो है जो मुझे सताता रहा है, तड़पाता रहा है मेरी तन्हाई में। डर कि जो कहा सब मैंने तो कहीं अपनों से दूर ना हो जाऊं मैं।

पर आज एक और डर मुझे सताता है। जो हुआ मेरे साथ उसे तो मैंने दिल में समेट लिया, पर कल क्या होगा ये ख्याल मुझे सताता है। उम्र के इस दौर पर जब हर कोई मेरी शादी की बात करता है। कोई भी बात हो जब माता-पिता के मुँह से य्ही निकलता है;
'कल को ससुराल जाकर भी ऐसे ही काम करोगी क्या?'

'क्या बेटी, कल को ससुराल में ऐसे ही हमारा नाम रोशन करोगी?'
ये सब सुनकर बहुत डर लगता है।
डर लगता है अपने भविष्य से, अपनी किस्मत से। क्या आखिर मेरे नसीब में लिखा है।

उससे भी बढ़कर एक और डर मुझे सताता है, जब मैं सोचती हूँ अपने हमसफ़र के बारे में। हर लड़की सँजोती है सपने अपने हमसफ़र को लेकर पर मुझे तो उससे भी डर लगता है। जीवन के मेरे अनुभवों ने मेरे दिल में जो घृणा और मेरे ज़हन में जिस डर को बिठाया है वो मुझे सोचने ही नहीं देता। सोचूँ भी तो कैसे सोचूँ एक सुंदर सुनहरे भविष्य को जब मेरा दिल अंधेरों से घिरा है।

क्या होगा अगर मेरा हमसफ़र भी उनके जैसा ही हुआ जिन्होंने मेरा तरुख जीवन की इतनी कड़वी सच्चाइयों से करवाया है?

अगर उसने भी किसी के साथ वही किया हो जो किसीने मेरे साथ किया था, क्या सह पाऊँगी मैं इस सच्चाई को?

बस ये ख्याल ही मुझे डरता है, और मेरा दिल कह उठता है;

"हाँ मुझे डर लगता है!"

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Hello my lovely readers,
Thank you for reading this short story of mine. The story was my first attempt to write a story, albeit a short one, in Hindi. I don't know if my efforts were successful or not but I wanted to give it a try. Thank you so much for giving this story your precious time. Much love for you all 😘❤
A few things,
The poem in this chapter is one I wrote back in 2014 while Palchhin (my hindi poetry book, if you don't know) was still ongoing. You can find this poem there and many more if you want to read more of my hindi works. I felt like this poem went well with the theme, so I included it here. Hope I didn't make a mistake in doing so.
Feel free to share your thoughts through comments. I'm ever eager to know your views.

Thank you for giving this story and this unnecessarily long Author's note your time.

Do share it with your friends as I have enter this story in #Wattys2016 and I really, really need your support.

Thank you once again.
Have a great time in this beautiful world full of stories and enjoy ☺

Your Friend,

Kanchan Mehta ❤

P.s- it's my birthday today. Feel free to send wishes ;)

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