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वो अनुभव पहला था आखरी नहीं, दुनिया में गलत और भी हैं बस एक ही आदमी नहीं, ये अहसास वक्त-वक्त पर होता रहा। ये समाज मर्दों की शय पर चलता है, इसका अहसास भी धीरे-धीरे होता रहा ।

अगले ही साल की बात थी, जन्माष्टमी थी। त्यौहार था माखनचोर का, मनमोहने के जन्म का अवसर था। हर मंदिर शहर में धूम-धाम से सजा था। लाइटें लगी थी, फूल पत्तों की सजावट घनी थी। झांकियाँ भी थी हर जगहा। कहीं झूले में नन्दलाल थे और माता यशोदा थी झूला रही, तो कहीं वसुदेव और देवकी कारागार में बैठे नन्हे शिशु को थे खिला रहे । मनमोहक दृष्य थे कान्हा से जुड़े जिन्हें देखने को भीड़ हज़ारों में उभरी थी ।

जहाँ नज़र जाती कृष्ण जीवन का एक मन मोहने वाला दृश्य नज़र आता। कहीं नन्हे बालक गोपियों संग खेल रहे थे तो कहीं नटखट नन्द लाल गोपियों संग रास खेल रहे थे। सजी धजी गोपियों की बीच ऐसे थे सुहा रहे के जान गए सब क्यूँ वो चित्तचोर कहलाए ।
आनन्दित थे सभी दर्शक, दृश्य ही इतने मनोहारी थे, बांसुरी हाथ में लिया गोपियों को तो निहार रहे। वहीं दूर एक झांकी में झूले पर विराजमान हो रुक्मणी जी को थे निहार रहे। हर तरफ ख़ुशी का समां था। इन झांकियों को देखने पूरा शहर उमड़ा था। हर मंदिर नयी दूल्हन की तरहां सजा था।

शौक था हमें भी मंदिर मंदिर घूमने का, साज-सजावट को देखने का, निहारने का उस सांवले सलोने की प्रतिमा को जिसने सबका मन मोह लिया था। सुबहा से उठते थे और घर सर पे उठाते थे। सारा दिन उधम मचाते थे। इंतज़ार के पल भारी लगते थे, बस माँ से यही पूछते थे;

"ये रात कब होगी?
कब जाएंगे हम झांकी देखने?
नए कपड़े पहनने दोगी ना आज तो?"

फिर शाम तक फरमाइशों की फ़हरिस्ट तैयार कर लेते थे, क्या खाएंगे, कहाँ जाएंगे, क्या-क्या वहाँ से लाएंगे। कह देते थे पापा से की आज हम कुल्फी खाएंगे, नहीं दिलाई तो देखना रुठ जाएंगे। वो भी हंस देते थे। पर डर कर कि हंसीं कहीं ना तो नहीं, हम बार-बार ये दोहराते थे। फिर थक कर वो कह ही देते थे;

"दिलाएंगे बाबा, सब दिलाएंगे। पहले चलो तो सही वरना कहीं कुल्फी ही तुम्हारे इंतज़ार में पिघल जाए।"

वो भी खुशनुमा दिन थे। बचपन की अच्छी यादों से भरे दिल को सुकून देने वाले दिन जो अब भूल गए है। रह गयी हैं तो बस यादें। क्योंकि वो खुशियां बस वक्ती थी और वो साल आखरी था, जब जन्माष्टमी में कुछ क्षणों की ख़ुशी का अनुभव मैंने किया था।

जो हुआ उस रात उसने मेरे मन को, मेरे उत्साह को तोड़ दिया था। उसके बाद जन्माष्टमी हर साल आयी पर मेरे लिए ये बस एक सरकारी छुट्टी रह गयी। ना ख़ुशी का त्यौहार था ये अब ना इसे मनाने का मेरा जी चाहता था। कोई उत्साह नहीं रहा अब इस मन में, ना कोई ख़ुशी का भाव। रह गई तो बस वो याद जो मुझे जीवन के एक ओर कड़वे सच की याद दिला जाती है। याद दिला जाती है कि खुशियाँ पल की होती हैं और गम भी । पर गम की याद जीवन भर इस ज़हन पर परछाइयों की तरहां रहती है । वो परछाई जो मरने तक इस तन का साथ नहीं छोड़ती । और मेरे मन की यही परछाई मुझे पल पल उस रात की याद दिलाती है। याद दिलाती है कि, किस कदर एक बच्ची के कोमल मन को कुछ नापाक लोगों के संयों ने इस तरह घेरा कि ना वो समझ पाई कि हुआ क्या और ना कह पाई कि मेरे साथ गलत हुआ।

हर साल की तरहां उस साल भी मैं अपने भाई बहनों संग जन्माष्टमी की झांकियाँ देखने गई। कई मंदिरों में घूमे हम। एक दूसरे का हाथ थामे, कहीं भीड़ में गुम ना हो जाएं हम। डर था भीड़ में बिछड़ने का पर झांकियाँ देखने का उत्साह भी खूब था। चहल-पहल देखने का मज़ा ही कुछ अलग था। कहाँ लगता था ये मौका फिर साल भर आखिर जन्माष्टमी का त्यौहार भी तो एक था। लोगों की भीड़ में कैसे कैसे निकलते थे, बस एक ही कोशिश करते थे कि हाथ न छूटे भाई का फिर चाहे कैसे भी निकालो बीच से क्या फर्क पड़ता था। सब कुछ पहले जैसा था। वही मंदिर, वही झांकियाँ और वही जगमगाहट जो छू जाती थी बच्चों के कोमल मन को। पर उस साल एक बात हर साल से अलग हुई। उस मंदिर में जाते भले ही हम हर साल थे पर नीचे ही दर्शन कर लौट आते थे, क्या करें पापा कभी जाने ही नहीं देते थे ऊपर। हर साल सोचते थे कि आखिर क्यूँ पापा ऐसा करते हैं बस आधा मंदिर दिखा कर वापिस ले आते हैं ।

पर उस साल इस सवाल का जवाब भी मिल गया। आख़िरकार जो पापा कहते थे वही सही था। ना बताया था कारण कभी उन्होंने अपने फैंसलों का पर जब कुछ किया बस हमारा भला सोच कर ही किया। उस साल जो घटा उसके बाद ये अहसास हुआ की न ही हर आदमी भला है, ना ही उनके लिए मंदिर का कोई मतलब है। है तो बस एक बीमार मानसिकता जिसका शिकार उस दिन मैं और मेंरे जैसी न जाने कितनी और लड़कियाँ बनती आयी हैं और बनती रहेंगी, क्यूंकि ये सोच ना कभी बदली है और ना ही बदलेगी। और इस बिमार सोच का खामियाज़ा आज तक सिर्फ स्त्री समाज ही भरता आया है और आगे भी भरता रहेगा।

उस रात पापा नहीं थे हमारे साथ, तो जैसे छूट मिल गई थी हमें। कुछ भी करें, कहीं भी जाएं कोई रोक-टोक नहीं। हम आज़ाद थे पर वो एक गलतफहमी थी। जिसका अहसास बहुत जल्दी हो गया पर अफ़सोस कि वो अहसास हुआ।

अब ज़ाहिर सी बात है बच्चों का मन चंचल होता है और आज़ादी मिलने पर वही करता है जिसे करने की मनाही हो। वही हमने किया। चढ़ गए मन्दिर के पहले माले पर घूम आए आख़िरकार पूरे मंदिर में ये ख्याल सुकून भरा था। जैसे बरसों की कोई ख्वाहिश उस पल में जा कर पूरी हुई। पर वो सुकून जल्द ही डर और दहशत में बदल गया जब वक़्त वापिस जाने का आया। सीढ़िया बहुत थी और सँकरी भी नहीं थी पर भीड़ इतनी थी कि सीढ़ियों पर उतरने में परेशानी हो रही थी। वक़्त लग रहा था, भीड़ भी आहिस्ते आहिस्ते उतर रही थी। हम भाई बहन भी भीड़ में बिछड़ गए। कोई आगे था तो कोई पीछे। चारों तरफ भीड़ में फंसे थे। एक कदम भी इधर से उधर करना मुश्किल था और जैसे सब वहीं थम गए थे। मेरी छोटी बहन मेरे आगे थी, मेरा ध्यान उसी पर था। तभी एक अहसास हुआ, जैसे कोई हाथ मेरे सीने को छू गया। मैं एकदम झल्लाई, मुड़कर देखा तो सब शांत था। हर तरफ लोग थे पर किसी के भी चेहरे पर दोष का भाव नहीं था। सब सीधे खड़े थे, कोई मेरी तरफ देख भी नहीं रहा था।

फिर दिल ने कहा 'शायद ये तेरा वहम था'। कुछ पल बीत गए, हम एक-दो सीढ़ी उतर आए पर फिर से वही हुआ। एक बार फिर कोई हाथ मेरे सीने को छू गया। फिर मैंने पीछे मुड़ कर देखा पर फिर वही हुआ। सब सीधे खड़े थे किसी के चेहरे पर अपराध बोध न था, और होता भी कैसे माथे पर बल तो तब पड़ते हैं ना जब इंसान माने के वो गलत कर रहा है। उन लोगों के लिए तो ये एक मजाक था पर मेरे लिए ये एक भयानक सच जो मेरे कोमल मन को झकझोड़ गया।

कुछ पल बाद मैंने फिर वो भद्दा स्पर्श महसूस किया पर इस बार मेरी बगल से, एक बार फिर वही हुआ जो पहले दो बार हुआ। वही मेरा मुड़ कर देखना, वही उनका निर्बोध खड़ा रहना। फिर जैसे उनकी हिम्मत बढ़ गयी अब एक नहीं कई हाथ मुझे छूने लगे। पीछे से नही दाँए से नहीं हर तरफ से वो मुझे जैसे नोचने लगे। सब जानते थे कि क्या हो रहा था पर कोई कुछ नहीं बोला। मेरी अपनी आवाज़ ने जैसे मेरा साथ छोड़ दिया। मेरा छोटा सा दिमाग ये समझ ही नी पाया कि आखिर हो क्या रहा था। मैं समझ ही नहीं पाई कि मुझे करना क्या था। बस चुप-चाप सहती रही, घुटती रही अंदर ही अंदर। मनाती रही कि ये सीढ़ियां जल्दी खत्म हों। खत्म हो ये मेरा कष्ट और मैं फिर से सुरक्षित महसूस कर सकूं।
कुछ समय बाद आख़िरकार सीढ़ियां खत्म हुई और हम सब भाई बहन फिर से मिले। बस उसके बाद मैंने ज़िद्द पकड़ ली कि अब घर वापिस चलो, नहीं जाना कहीं अब, बस घर चलो। बहुत पूछा उन्होंने और मनाया भी पर मैं नहीं मानी, जी भर गया था मेरा अब तो बस घर जाना था। अकेले में बैठ रोना था मुझे। जो हुआ मेरे साथ उसे बतलाऊँ किसी को ऐसी हिम्मत नहीं थी मुझमें। मेरा अकेलापन ही मेरा सहारा था।

बस वो साल आखिरी थी जब जन्माष्टमी मैंने मनाई थी। अब तो बस एक कड़वी याद है और सबक कि माँ-बाप बेहतर जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। बहुत पछताई मैं उस दिन उनकी बात को अनदेखा कर इसलिए आज ये आलम है कि जन्माष्टमी के नाम से डर लगता है। डर लगता है जब मेरी भान्जी बड़े प्यार से मुझसे कहती है कि; "मांसी चलो ना मन्दिर देखने चलते हैं। कान्हा के दर्शन को चलते हैं।"
समझ नहीं आता कि क्या कहूँ उससे, कैसे कहूँ के ये त्यौहार नहीं बस घटिया लोगों की मौज के लिए एक बहाना है। उनके भद्दे मजाक का एक फ़साना है। जी करता है उसे सीने से लगा वहीं छुपा लूँ और कहुँ 'मत जा बेटा, वहाँ सब गन्दा है।'
पर कहूँ तो कैसे कहूँ आखिर "मुझे डर लगता है!"

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