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एक छोटे से शहर के मध्यम वर्गीय परिवार की बेटी हूँ मैं। घर में सबसे छोटी, पर सबकी लाड़ली मैं। हर तरहां के लाड लड़ाए जाते हैं मुझे। तभी तो बचपन से ही सिरजोर रही हूँ, मज़ाल किसी की जो मैं कुछ कहूँ और वो ना हो, या जो चाहूँ वो मुझे ना मिले। हर चीज़ मिलती थी, प्यार मिलता था। जीवन खुशहाल था। मैं भी खुश थी। जीवन छोटी-छोटी खुशियों से, चीजों से भरा था ।

घर में सब लाड लड़ाते थे तो सख्ती भी करते थे। माँ-बाप से, ताया-ताई से, दादी से सबसे ज़िद्द करके, रो के या प्यार से अपनी हर बात मनवा लेते थे । पर दादा जी, उनसे डर लगता था। ऐसा नहीं था कि लाड नहीं करते थे या बहुत मारते थे पर फिर भी उनसे डर लगता था ।

अब आप सोच रहे होंगे कि जब लाड भी करते थे और मारते भी नहीं थे तो डर क्यूँ लगता था उनसे? अजी डर उनसे नहीं, उनके गणित से लगता था । ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे पर अपने ज़माने के हिसाब से बहुत पढ़ चुके थे। गणित में तो जवाब ही नहीं था उनका, जमा-घटा, गुणा-भाग के ऐसे सवाल करते थे कि हम तो चकरा ही जाते थे। ना घुसते थे उनके तर्क हमारे छोटे से दिमाग में। पर सबसे ज़्यादा डर उनके पहाड़ों से लगता था ।
गर्मियों में तो हम शाम ढ़ले ही सोने का नाटक कर लेते थे। दादा जी दूकान से लौटें उससे पहले ही माँ से खाना बनवा खा लेते थे। डरते थे कि आज जो हत्थे चढ़े दादा जी के तो तो बेटा शामत ही आएगी ।

अब आप सोचते होंगे कि गणित ही तो है, जमा-घटा, गुणा-भाग में क्या जाता है। पर जैसा मैंने कहा असल मसला तो पहाड़ों का था ।

ये भी नहीं के 13 या 15 का पहाङा सुनें। अरे नहीं वो तो हमारे अध्यापकों से भी एक कदम आगे थे । जहाँ वो 20 तक के पहाड़े याद करवाते थे वहीं हमारे दादा जी उलटे चलते थे। वो सुनते थे तो आधे (1/2) का, डेढ़ (1 1/2) का या फिर ढाई (2 1/2)का पहाड़ा।
जब हम शिकायत करते तो कहते थे;

"तुम्हारे उस्ताद तुम्हे जो भी पढ़ाए पर ये तो तुम्हे सिर्फ मैं ही पढ़ा सकता हूँ ।"

और ये पहाड़े उन्हें ज़बानी याद थे। आज भी जब बीते दिनों को याद करती हूँ तो सोच में पढ़ जाती हूँ कि,
'आखिर दादा जी के इतने प्रयासों बाद भी हम गणित में इतने निकम्मे कैसे रह गए!'
हम तो जो थे सो थे, हमारी अगली पीढ़ी तो एक कदम हमसे भी आगे । मुझे याद है कुछ साल पहले मेरे दादा जी ने मेरे भांजे से पहाड़े सुने।
वो दृष्य भी निराला था, जब भी याद आता है होठों पर मुस्कुराहट ले ही आता है। एक तरफ हमारे दादा जी पुराने ज़माने के तो, दूसरी ओर हमारे भांजे श्री नए ज़माने के प्रतीनिधी और इन दोनों के बीच में मैं।
अगर कोई दूर से देखता तो खुश हो कर कहता कि 'देखो तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठी हैं!'
पर इस पर मैं उनसे कहती कि, 'तीन पीढ़ियाँ ही नहीं अपितु तीन शिक्षा माध्यम भी एक साथ आए हैं।'
एक तरफ मेरे दादा जी जो आज़ादी से भी पहले के पढ़े थे और जिनकी शिक्षा का माध्यम उर्दू था, तो दूसरी तरफ मेरे भांजे श्री जो आज-कल के चलन अनुरूप ही अंग्रेजी माध्यम के छात्र और फिर इन दोनों के बीच में फंसी मैं हिन्दी माध्यम की छात्रा ।
ये कोई अजीब बात नहीं थी पर हक़ीक़त थी ज़िन्दगी की, के पुराने और नए माध्यमों के बीच ये हिंदी माध्यम ही था जो सेतु का कार्य कर रहा था ।
हमारे दादा जी ने आदत अनुसार ही अपना पुराना तरीका आज़माना शुरू कर दिया। पहले तो कुछ सवाल पूछे फिर जल्दी ही पहाड़ों पर आ गए । और पहाड़े भी सीधे नहीं कटवे।
उन्होंने बड़े आराम से पंजाबी में पूछा;

"सत्तू अट्ठा"

दादा जी जहाँ होठों पर मुस्कान लिए उसे देखते रहे और इंतज़ार करते रहे अपने सवाल के जवाब का। वहीं दूसरी ओर हाल ज़रा बुरे थे। बेचारे मेरे भांजे के चेहरे पर भाव ही कुछ और थे। कशमकश थी कि आखिर सवाल नाना जी ने किया तो क्या किया। बेचारा पहले उनकी तरफ देखे और फिर मुझे।

हाय बेचारा!

इतनी मासूमियत से मुझे देखा उसने के क्या कहूँ। आ ही गया तरस फिर मुझे उसपे और मैंने कहा,

"बेटा बताओ 'सेवन एट्स द'" (seven eights the)
और ये सुनते ही चेहरे पर छाए कुछ परेशानी के भाव उठ गए और वो उंगलियो पर पहाड़ा गिनने बैठ गया। वहीं मेरे दादा जी जो काफी देर से इंतज़ार कर रहे थे सोच में पड़ गए । इस बात पर भी उन्हें हैरानी हुई की क्यों मैंने उनके सवाल को अंग्रेजी में दोहराया। शायद पूछना भी चाहते थे पर इससे पहले की वो सवाल कर पाते उनके पिछले सवाल का जवाब मिल गया । और जल्दी से गिनती पूरी करते ही मेरा भांजा बोल पड़ा;

"फिफ्टी सिक्स!"

एक बार फिर मुई अंग्रेजी बीच में आ गयी। पंजाबी के सवाल का जवाब जब अंग्रेजी में आए तो बेचारी हिन्दी को ही बीच में कूदना पड़ता है । और ठीक पहले की ही तरह नज़रें मेरी तरफ मुड़ गयी, बस इस बार नज़रें मेरे भांजे की ना होकर मेरे दादा जी की थी। इसलिए अपना कर्तव्य मानते हुए एक बार फिर मैंने अनुवादक की जगहा ले ली और जवाब दिया;

"छप्पन!"

इसी तरहा ये सवाल जवाब का सिलसिला कुछ और चला पर वक़्त के साथ साथ मेरे भांजे के चेहरे के भाव बदलते गए। हर सवाल के साथ उसे एक नया काम याद आने लगा। कभी कहता 'मांसी ये काम है' और कभी 'मांसी मुझे वहाँ जाना है', तो कभी प्यारी प्यारी बातें कर के नाना जी को फुसलाने की कोशिश करता और कहता;

"बस नाना जी ऐसे टेबल्स नहीं आते। सीधे-सीधे सुन लो ना!"

खैर कुछ देर बाद उन्होंने खुद ही उसे अपनी कैद से आज़ाद कर दिया और वो उछलता-फुदकता वहाँ से चला गया ।

उस दिन मुझे उससे बहुत जलन हुई। और मैं सोचने लगी कि दादा जी हमें इतनी जल्दी क्यों नहीं छोड़ते थे। जब हम उनकी बन्धिशों से आज़ाद होने को बेताब होते थे और खुल कर कहते थे कि 'दादा जी से डर लगता है!'

पर कितने अंजान थे हम उस वक़्त, नहीं जानते थे कि असल में डर क्या होता है।

पर आज हम जानते हैं कि असल डर क्या होता है । शायद इसीलिए खुल कर कहते हैं

"हाँ मुझे डर लगता है !"

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